July 8, 2026 |
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पीएम मोदी पर अमेरिकी टिप्पणियाँ: ‘नवारो’ के तीखे बयानों से लेकर रणनीतिक साझेदारी तक, क्या है अमेरिका की राय?

अमेरिका की नज़र में पीएम मोदी: एक जटिल और बदलता दृष्टिकोण

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अमेरिका की नज़र में पीएम मोदी: एक जटिल और बदलता दृष्टिकोण

भारत और अमेरिका के बीच संबंध, जो एक समय केवल औपचारिक हुआ करते थे, अब एक जटिल और बहुआयामी साझेदारी में बदल चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, यह रिश्ता और भी गहरा हुआ है, लेकिन इसमें कुछ नए तनाव भी सामने आए हैं। हाल ही में, अमेरिका के कुछ प्रभावशाली राजनेताओं और मीडिया शख्सियतों द्वारा की गई टिप्पणियों ने इस बात को और भी स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका में पीएम मोदी और भारत की विदेश नीति को लेकर अलग-अलग राय मौजूद हैं।

विशेष रूप से, अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वरिष्ठ व्यापार सलाहकार रहे पीटर नवारो के हाल के बयान काफी सुर्खियों में रहे हैं। उनकी टिप्पणियाँ केवल एक व्यक्ति की राय नहीं हैं, बल्कि अमेरिकी राजनीतिक स्पेक्ट्रम के एक महत्वपूर्ण हिस्से की सोच को दर्शाती हैं।

पीटर नवारो की तीखी टिप्पणियाँ: ‘भारत को हमारी ज़रूरत है, रूस की नहीं’

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के एक मुखर सदस्य, पीटर नवारो ने हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी और भारत की विदेश नीति पर बहुत ही तीखी टिप्पणी की है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मुलाकात के बाद, नवारो ने एक इंटरव्यू में कहा कि यह “शर्म की बात है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेता दो सबसे बड़े निरंकुश तानाशाहों के साथ बिस्तर में जा रहा है।” उन्होंने कहा, “मोदी को देखकर शर्म आती है…” और यह भी जोड़ा, “भारत को हमारी ज़रूरत है, रूस की नहीं।”

नवारो का आरोप था कि भारत, रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदकर यूक्रेन में युद्ध को बढ़ावा दे रहा है। उन्होंने इसे “मोदी का युद्ध” तक कह दिया। उनका तर्क है कि भारत अपने इस व्यापार से मुनाफा कमा रहा है, जबकि अमेरिका और यूरोपीय देशों को यूक्रेन की मदद के लिए और अधिक पैसा खर्च करना पड़ रहा है। नवारो ने इस संदर्भ में एक विवादास्पद टिप्पणी भी की, जिसमें उन्होंने भारत के “ब्राह्मणों” पर भारतीय लोगों की कीमत पर मुनाफा कमाने का आरोप लगाया। यह टिप्पणी भारत में जातिगत विभाजन को लेकर एक गंभीर और संवेदनशील मुद्दा थी, जिसकी कई हलकों में आलोचना हुई।

बयानों के पीछे का संदर्भ: व्यापार और कूटनीतिक तनाव

नवारो की ये टिप्पणियाँ केवल कूटनीतिक असंतोष का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह अमेरिका द्वारा हाल ही में भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए भारी टैरिफ के संदर्भ में आई हैं। अमेरिका ने भारत से आयात होने वाली कई वस्तुओं पर 50% तक का नया टैरिफ लगाया है, जिसमें से 25% का संबंध रूस से तेल खरीदने से है। नवारो ने इन टैरिफ का बचाव करते हुए कहा है कि ये भारत की अनुचित व्यापार नीतियों का जवाब हैं।

यह दर्शाता है कि अमेरिका के कुछ राजनीतिक गुटों में यह धारणा है कि भारत अपने आर्थिक लाभ के लिए अमेरिका के हितों को दरकिनार कर रहा है। नवारो जैसे लोग चाहते हैं कि भारत अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ एक स्पष्ट पक्ष ले, खासकर यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर।

व्यापक अमेरिकी दृष्टिकोण: एक रणनीतिक दुविधा

हालांकि, अमेरिका में हर कोई नवारो की राय से सहमत नहीं है। अमेरिकी मीडिया और थिंक-टैंक में एक व्यापक बहस चल रही है जो भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को समझती है।

  • रणनीतिक साझेदारी: अमेरिका में एक बड़ा वर्ग भारत को चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानता है। क्वाड (Quad) जैसे मंच, जिसमें अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, इसी सोच का परिणाम हैं। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ और राजनेता अक्सर भारत को एक “प्रमुख रक्षा भागीदार” के रूप में देखते हैं और दोनों देशों के बीच रक्षा व्यापार लगातार बढ़ रहा है।
  • मीडिया और राजनीतिक टिप्पणियाँ: सीएनएन, न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे प्रमुख अमेरिकी मीडिया आउटलेट्स ने भी इस बात पर रिपोर्ट किया है कि पीएम मोदी की रूस और चीन के साथ मुलाकातें ट्रंप के टैरिफ के जवाब में हो सकती हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का “अमेरिका फर्स्ट” का दृष्टिकोण भारत जैसी शक्तियों को अमेरिका से दूर कर रहा है और उन्हें एक बहुध्रुवीय दुनिया में अपने लिए नए रास्ते तलाशने के लिए मजबूर कर रहा है।
  • कूटनीति की जटिलता: अमेरिका के कई नेता यह स्वीकार करते हैं कि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है जिसकी अपनी विदेश नीति है, और वह केवल किसी एक गुट का हिस्सा नहीं बन सकता। भारत रूस के साथ अपने ऐतिहासिक और सैन्य संबंधों को पूरी तरह से नहीं छोड़ सकता, जबकि वह अमेरिका के साथ भी अपनी साझेदारी को मजबूत कर रहा है। यह भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

निष्कर्ष: एक मजबूत लेकिन तनावपूर्ण रिश्ता

कुल मिलाकर, अमेरिका में पीएम मोदी के बारे में टिप्पणियाँ एक जटिल तस्वीर पेश करती हैं। एक तरफ, पीटर नवारो जैसे नेताओं की तीखी और कभी-कभी विवादास्पद आलोचनाएँ हैं, जो भारत को एक स्पष्ट पक्ष लेने के लिए मजबूर करना चाहती हैं। दूसरी तरफ, अमेरिका के कूटनीतिक और रणनीतिक हलकों में यह समझ है कि भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए अपने फैसले लेगा।

यह संबंध दोस्ती और सहयोग के साथ-साथ तनाव और मतभेदों का भी मिश्रण है। यह भारत के एक उभरती हुई शक्ति के रूप में उदय को दर्शाता है, जो अब केवल बाहरी ताकतों के आदेशों का पालन नहीं करता, बल्कि वैश्विक मंच पर अपने स्वतंत्र हितों की रक्षा करता है। अमेरिका में हो रही ये टिप्पणियाँ इस बात का सबूत हैं कि भारत की आवाज अब इतनी मजबूत हो गई है कि उसे अनदेखा करना संभव नहीं है, भले ही वह किसी-किसी को पसंद न आए।

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