July 14, 2026 |
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बिहार की राजनीति में भूचाल: राहुल गांधी की चाल पर राजद की होशियारी पड़ी भारी, 105 सीटों की मांग से महागठबंधन में पड़ी दरार

बिहार में महागठबंधन का भविष्य: वर्चस्व की लड़ाई बनाम अस्तित्व का संकट

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पटना: बिहार की सत्ताधारी महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं है। विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही, राजद और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर शुरू हुई जंग ने अब खुले तौर पर दरार का रूप ले लिया है। इस बार, यह केवल सीटों की संख्या का मसला नहीं है, बल्कि यह महागठबंधन में अपने-अपने वर्चस्व और अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है। राहुल गांधी की हाल ही में संपन्न हुई ‘वोटर अधिकार यात्रा’ ने कांग्रेस को एक नई संजीवनी दी है, और इसी आत्मविश्वास के साथ पार्टी ने राजद को 105 सीटों की एक चौंकाने वाली लिस्ट सौंप दी है।

राजद की ‘होशियारी’ और कांग्रेस की ‘चाल’

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ चुनावों में राजद ने हमेशा कांग्रेस को एक “जूनियर पार्टनर” की तरह ट्रीट किया। कांग्रेस को वही सीटें दी गईं, जहाँ उसकी जीत की संभावनाएँ कम थीं। उदाहरण के लिए, 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन उसे सिर्फ 19 सीटों पर ही जीत मिली। राजद की यह ‘होशियारी’ लगातार कांग्रेस को कमजोर करती रही और राजद को अपने उम्मीदवारों के लिए रास्ता साफ करने में मदद करती रही।

लेकिन, इस बार कांग्रेस ने भी एक ‘चाल’ चली है। राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का मुख्य उद्देश्य केवल मतदाताओं से सीधे जुड़ना नहीं था, बल्कि यह राजद को यह स्पष्ट संदेश देना था कि कांग्रेस अब अपने दम पर भी मैदान में उतरने को तैयार है। इस यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने उन सभी विधानसभा क्षेत्रों का दौरा किया, जहां पिछली बार कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था। इस रणनीति से कांग्रेस ने इन सीटों पर अपनी दावेदारी को मजबूत करने का काम किया है। 105 सीटों की जो लिस्ट कांग्रेस ने सौंपी है, उसमें कई ऐसी सीटें शामिल हैं, जो पूर्व में राजद के पास थीं या जिन पर राजद अपना दावा मजबूत मानती थी।

आंतरिक चुनौतियों से घिरा गठबंधन

यह संघर्ष केवल दो दलों के बीच नहीं है, बल्कि दोनों ही पार्टियों के भीतर भी है।

  • राजद के भीतर का दबाव: तेजस्वी यादव इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं। एक तरफ, उन्हें कांग्रेस को संतुष्ट करना है, वहीं दूसरी तरफ, उन्हें अपनी पार्टी के भीतर के नेताओं को भी संभालना है। राजद के कई वरिष्ठ नेता और विधायक इस बात से नाराज हैं कि अगर कांग्रेस को इतनी सीटें दी गईं, तो उनकी खुद की सीटों पर खतरा बढ़ जाएगा। वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि राजद को अपने मुख्य जनाधार (मुस्लिम और यादव) की सीटों को नहीं छोड़ना चाहिए।
  • कांग्रेस की आंतरिक बहस: कांग्रेस के भीतर भी सभी नेता इस आक्रामक रणनीति से सहमत नहीं हैं। कुछ नेताओं का मानना है कि यह राजद को नाराज कर सकता है, जिससे गठबंधन टूट सकता है। वे तर्क दे रहे हैं कि यह जुआ बिहार में कांग्रेस की स्थिति को और खराब कर सकता है।

पिछले चुनावों का आईना और जनता की राय

पिछले विधानसभा चुनावों के निराशाजनक परिणाम कांग्रेस को यह बताने के लिए काफी हैं कि उसे अपनी रणनीति बदलनी ही होगी। 2020 में 70 सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद सिर्फ 19 जीतना, पार्टी के लिए एक बड़ा सबक था। कांग्रेस को अब यह महसूस हो रहा है कि वह राजद की दया पर नहीं रह सकती।

इस आपसी खींचतान पर बिहार की आम जनता की भी पैनी नजर है। मतदाता एक मजबूत और एकजुट गठबंधन को पसंद करते हैं, जो उन्हें एक स्थिर सरकार दे सके। इस तरह की कलह से मतदाताओं में निराशा फैल सकती है, और वे यह मान सकते हैं कि यह गठबंधन केवल सत्ता के लिए बना है।

विपक्ष की पैनी नजर और प्रतिक्रिया

महागठबंधन में चल रही इस खींचतान पर भाजपा और जद (यू) की पैनी नजर है। दोनों दल इस दरार का फायदा उठाने का इंतजार कर रहे हैं। भाजपा नेताओं ने इस स्थिति को एक अवसर के रूप में भुनाना शुरू कर दिया है।

  • भाजपा नेता ने तंज कसते हुए कहा, “महागठबंधन केवल ‘घमंडिया गठबंधन’ है और अब यह सबके सामने है। इनमें एकता नहीं है, सिर्फ कुर्सी की भूख है। बिहार की जनता इस आपसी झगड़े को देख रही है।”
  • जद (यू) का रुख: नीतीश कुमार की जद (यू) भी इस पूरे घटनाक्रम को करीब से देख रही है। अगर महागठबंधन टूटता है, तो जद (यू) के लिए भी नए राजनीतिक समीकरणों की संभावना खुल सकती है।

निष्कर्ष:

बिहार की राजनीति में अब कोई भी दल अकेले ताकतवर नहीं रहा। राजद की ‘होशियारी’ पर राहुल गांधी की ‘चाल’ ने यह साबित कर दिया है कि कांग्रेस अब अपनी शर्तों पर खेलने को तैयार है। समन्वय समिति की बैठक का परिणाम ही यह तय करेगा कि महागठबंधन का भविष्य क्या होगा। क्या यह गठबंधन एकजुट रहेगा या फिर सीटों के बंटवारे को लेकर टूट जाएगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन, एक बात तय है कि बिहार में सत्ता का समीकरण अब पहले से कहीं अधिक जटिल हो गया है।

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